शनि के कारण होने वाले रोग दशा फल  शान्ति के उपाय 

 ज्योतिष शास्त्र में शनि :-
ग्रह मंडलमें शनि को सेवक का पद प्राप्त है| यह मकर और कुम्भ राशियों का स्वामी है | यह तुला राशि में उच्च का तथा मेष राशि में नीच का माना जाता है | कुम्भ इसकी मूल त्रिकोण राशि भी है| शनि अपने स्थान से तीसरे, सातवें,दसवें स्थानको पूर्ण दृष्टि से देखता है और इसकी दृष्टि को अशुभकारक कहा गया है | जनमकुंडली में शनि षष्ट ,अष्टम भाव का कारक होता है |शनि की सूर्य -चन्द्र –मंगल से शत्रुता , शुक्र – बुध से मैत्री और गुरु से समता है | यह स्व ,मूलत्रिकोण व उच्च,मित्र राशि –नवांश में ,शनिवार में ,दक्षिणायन में , दिन के अंत में ,कृष्ण पक्ष में ,वक्री होने पर ,वर्गोत्तम नवमांश में बलवान व शुभकारक होता है |
शनि के कारकत्वशनि के कारकत्व :-
प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार शनि लोहा ,मशीनरी ,तेल,काले पदार्थ,रोग, शत्रु,दुःख ,स्नायु ,मृत्यु ,भैंस ,वात रोग ,कृपणता ,अभाव ,लोभ ,एकांत, मजदूरी, ठेकेदारी ,अँधेरा ,निराशा ,आलस्य ,जड़ता ,अपमान ,चमड़ा, पुराने पदार्थ ,कबाडी ,आयु ,लकड़ी ,तारकोल ,पिशाच बाधा ,संधि रोग ,प्रिंटिंग प्रैस ,कोयला ,पुरातत्व विभाग इत्यादि का कारक है |
 शनि के कारण होने वाले रोग :-
वास्तुशास्त्री एवं ज्योतिषाचार्य के अनुसार जन्म कुंडली में शनि अस्त ,नीच या शत्रु राशि का ,छटे -आठवें -बारहवें भाव में स्थित हो ,पाप ग्रहों से युत या दृष्ट, षड्बल विहीन हो तो कोढ़ ,वात रोग ,स्नायु रोग , पैर व घुटने के रोग ,पसीने में दुर्गन्ध , संधिवात, चर्म रोग , दुर्घटना , उदासीनता , गठिया ,थकान ,पोलियो इत्यादि रोग उत्पन्न करता है |
 फल देने का समय :-

शनि अपना शुभाशुभ फल 36 से 42 वर्ष कि आयु में ,अपने वार व शिशिर ऋतु में,अपनी दशाओं व गोचर में( साढ़ेसाती व ढैया में ) प्रदान करता है | वृद्धावस्था पर भी इस का अधिकार कहा गया है |
शनि का सामान्य दशा फल 
शनि की दशा में राज सम्मान ,सुख वैभव ,धर्म लाभ,ग्राम -नगर व किसी संस्था के प्रधान पद कि प्राप्ति ,जन समर्थन , शनि के कारकत्व वाले पदार्थों से लाभ ,पश्चिम दिशा से लाभ ,स्टील ,कोयला व तेल कंपनियों के शेयरों से लाभ ,समाज कल्याण के कार्य ,पुराने आवास व वाहन कि प्राप्ति ,आध्यत्मिक ज्ञान व चिंतन ,विचारों में स्थिरता व प्रोढ़ता,व्यवसाय में सफलता ,पशुओं के व्यापार में सफलता ,वृद्धा स्त्री का संसर्ग प्राप्त होता है | जिस भाव का स्वामी शनि होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में सफलता व लाभ होता है |
यदि शनि अस्त ,नीच शत्रु राशि नवांश का ,षड्बल विहीन ,अशुभभावाधिपति पाप युक्त दृष्ट हो तो शनि की अशुभ दशा में उद्वेग,वाहन नाश ,अप्रीति ,स्त्री व स्वजनों से वियोग ,पराजय ,शराब व जुआ से अपकीर्ति ,वात जन्य रोग ,शुभ कार्यों में असफलता ,बंधन , आलस्य ,निराशा ,मानसिक तनाव , शरीर में शुष्कता व खुजली .थकान ,शरीर पीड़ा ,अंग भंग , नौकर व संतान से विरोध होता है |शनि के कारकत्व वाले पदार्थों से हानि होती है | जिस भाव का स्वामी शनि होता है उस भाव से विचारित कार्यों व पदार्थों में असफलता व हानि होती है |
 शनि शान्ति के उपाय 

जन्मकालीन शनि निर्बल होने के कारण अशुभ फल देने वाला हो या शनि कि साढ़ेसाती व ढैया अशुभ कारक हो तो निम्नलिखित उपाय करने से बलवान हो कर शुभ फल दायक हो जाता है |
 शनि गृह की शान्ती के लिये हर शनिवार को पिपल के पेड मे सरसो के तेल का दिपक लगाये, हनुमानजी के दशन करे तथा हनुमान चालिसा का पाठ करे, पत्येक शनिवार को शनिदेव को तेल चढाये तथा दशरथकृत शनि स्रोत का पाठ करे, तथा शनि की होरा मे जलपान नही करे, साथ ही काले कपडे पहने नही| केवल शनि ही नही, सभी नवग्रहो कि शांति के लिए ‘ग्रहमक’ नमक यज्ञ घर में किया जाता है जिस से नवग्रहो कि शांति हो पीड़ा समाप्त होती है. किसी पंडित द्वारा किया जाता है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *